आइन्स्टाइन को देखकर शिक्षक क्रोधित कहते है " मुर्ख खाली बेकार के सपना मे उलझना ही जाना है कोई
काम धन्दा नही है, एकल प्राणी मन्दबुद्धि वाले लड़के , तु भभिस्य मे कुछ नही कर सकता
है "
यह कटु सत्य है कि आइन्स्टाइन चार वरस के उमर मे भी नही बोलना जानते थे जबकि खास
आम बच्चे दो बरस मे भी बोलना जानते है / सात बरस तक के पहुचते हुए भी उनको पढना नही
आया , जबकि दुसरे बच्चे तिन , चार बरस मे हि सब्द पहेचंना जाता है / जुरिच पोलिटिक्निक
मे तो उनका स्कूल मे भर्ना तक नही हुआ / इतना मन्द बुद्दी क़ा बालक आखिर कालान्तर मे सबसे प्रखर बैज्ञानिक बन गए, और
सफलतम संसार के बैज्ञानिक सिद्द हुए/ कसै सम्भव हुआ / वे वास्तव मे शब्द से ज्यादा
चित्र द्वारा हि सोचते और विचार करते थे, इस प्रकार वे अपने सोच्ने कि तरिका काम करने
कि तरिका द्वारा सफल हुए येही उनका सफलता क़ा सुत्र है / हमारा वर्तमान जित्न भी पीडादायक
हो , कुरुप हो कमजोर हो तो भी भभिसय को स्वर्णिम बनाया जा सकता है / अतः आज से हि,अभि
से आपने को आइन्स्टाइनिकरण करना सुरु करे अर्थात् चित्र
द्वारा सोच्ने क़ा अभ्यास करे / यानी विचारको चित्र मे बदल्ने
का अभ्यास करे / ही
रात को सोने के पुर्ब बिस्तर मे लेते
हुए दिनभर क़ा एक एक घटना और कल्पना करते हुए विब्चना करे सम्झे और कल क़ा जो काम हमको
करना है अपनी कल्पना मे उतार के सोना चाहिए इसप्रकार सोने से पूर्व निश्चय करके सफलता
के लिए आदत मे सुधार करे /
सकारातम
जुनुन, ईख कl कमाल /
बिथोविन
विश्व ---विख्यात संगीतकार विथोविन
अपने प्रशिक्षक से भवाईलिन सिख रहेथे/ परन्तु
वे अन्य परिक्षात्री के तुलना मे वे बहुत कमजोर और गतिशील नही थे/ वे
उतना अपने सिक मे सुधार नही कर सके थे नही कोइ सुधार उनमे दिखा / उनके टिचर ने उनको
मुख मे हि कद्दा वचन कह दिया ----बिथोलिन , तुम संगीतकार के रुप मे सफल होना आसर नही
दिखता और कोइ आशा नही कर सक्तI तुमसे/
याद रखिए--- यही कमजोर परिक्षात्री एक दिन येसे चम्के कि प्रतिभावान जिनसे लोहi
लेना पडा सभी सiथियो परास्त किया / इस इख जुनुन को लेकर अपने लक्ष्य मे जो लगजाये तो
सोय हुए प्रतिभा जागृत होकर सफल बनादेता है और सोई हुई प्रतिभा तुरन्त जाग जाति है
/ इसी कारण सफल होने के लिए भी जुनुन सफल होने के लिए जरुरि है /

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